आज पंकज त्रिपाठी के साथ कर रहे एक्टिंग; कभी नाटक में चाय-समोसा पहुंचाते थे | Bollywood Actor Arjun Bonthiyal Sushil Bonthiyal Real Life Struggle Story; From Spot Boy To OTT Platform

  • Hindi news
  • Db original
  • Bollywood Actor Arjun Bonthiyal Sushil Bonthiyal Real Battle Story; From Spot Boy to OTT platform

10:

डायरेक्टर प्रोड्यूसर एकता कपूर के टीवी सीरियल में चपरासी, वार्ड बॉय, झाड़ू लगाने वाले का रोल भी हैंडसम लड़कों को ही मिलता था। बिल्कुल गया गुजरा था। जो हीरो जैसा दिखता, उसको जब वार्ड बॉय का रोल मिलता, तो सोचता कि मुझे किस तरह का रोल मिलेगा।

3 हजार से ज्यादा ऑडिशन देने के बाद भी न तो किसी फिल्म और न ही सीरियल में काम मिला। बिस्तर समेट लिया था। एक्टिंग की दुकान बंद कर ली थी, पर घर वालों ने सभी को बता दिया था कि मेरा बेटा मुंबई हीरो बनने गया है। नहीं लौट सकता था।

पूरी तरह टूट चुका था। था कि अब तो एक्टर बनने का सपना खत्म हो गया। पर संदेह होने लगा कि वाकई में मैं एक्टिंग कर भी पाता हूं या नहीं? सालों तक चलता रहा।

2011 फूलन देवी पर आधारित सीरियल ‘फुलवा’ में काम मिला। 5 हजार लोगों के ऑडिशन होने के बाद मुझे पिता का रोल मिला था। 6 साल के संघर्ष के बाद एक पिता का कैरेक्टर… अब आप इस दर्द को समझ सकते हैं।

एक्टर अर्जुन बौंठियाल (सुशील बौंठियाल) उर्मिला मातोंडकर की ‘तिवारी’ वेब सीरीज की शूटिंग के लिए भोपाल में हैं। अपनी कहानी कहते हुए संघर्ष के दिनों में लौटते हैं।

अर्जुन बौंठियाल ने ‘फुलवा’ सीरियल में फूलन देवी के पिता का किरदार निभाया था। देवी का रोल एक्ट्रेस जन्नत जुबैर ने प्ले किया था।

बताते हैं, लोअर मिडिल क्लास फैमिली में पैदा हुआ। के रहने वाले हैं। लखनऊ में नौकरी करते थे, तो यहीं शिफ्ट हो गए। चपरासी थे, प्रमोशन होकर क्लर्क बने।

मैं एवरेज स्टूडेंट था। 5वीं क्लास में मुझे प्रार्थना के लिए चुना गया था। नाटक जैसे कल्चरल प्रोग्राम में पार्टिसिपेट करने लगा। कव्वाली था। याद है कि एनुअल डे के दिन लड़की का रोल प्ले किया था। नाटक करने में मजा आने लगा।

12वीं में जबरदस्ती साइंस लेना पड़ा। मैं मन से एक्टर बन चुका था, लेकिन घरवालों ने मैथ्स, फिजिक्स, केमिस्ट्री में उलझा दिया।

किसी को नाटक के बारे में नहीं बताया?

अर्जुन कहते हैं, मां से नाटक में जाने के बारे में बताता था, क्योंकि पापा से डरता था। मंच कृति थिएटर में नाटक करने लगा। शुरुआत में तो 2 साल तक कोई स्टेज परफॉर्मेंस का मौका नहीं मिला। -पानी पिलाने, दरी बिछाने का काम करता था।

डेढ़ साल के बाद नाटक में नारद का एक छोटा सा रोल मिला। के लोगों ने खूब पसंद किया। घर वालों को दिखाने के लिए लखनऊ यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन भी कर रहा था। 1997 है।

नाटक करने के पैसे नहीं मिलते थे। चाय-समोसे मिल गए, अखबार में थोड़ा-बहुत छप गया, बस इतना ही, लेकिन लखनऊ दूरदर्शन में नाटक के पैसे मिलते थे। एक हजार रुपए मिले। जब पापा को दिया, तो उन्होंने चौंकते हुए कहा, -नौटंकी के भी पैसे मिलते हैं?

(नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा) सिलेक्शन हुआ?

अर्जुन बताते हैं, उस वक्त बहुत कम ऐसे स्टूडेंट्स होते थे, जिनका फर्स्ट अटेम्प्ट में सिलेक्शन होता था। मेरा गया। तो शायद कभी एक्टर नहीं बन पाता। पापा कहते- बहुत हो गया नाटक-नौटंकी, अब नौकरी करो।

वक्त ‘मुंगेरीलाल के हसीन सपने’ शो आता था। एक्टर थे, हाइट कम थी। दिखते भी नहीं थे। उदाहरण मैं मां को बताता था। उनसे पूछता था कि जब ये एक्टर बन सकते हैं, तो मैं क्यों नहीं।

एनएसडी में सिलेक्शन तो हो गया, लेकिन एक लाख का बॉन्ड भरने के लिए पापा के पास पैसे नहीं थे। ये पैसा सरकार को देना होता है कि यदि कोई स्टूडेंट बीच में ही कोर्स छोड़ देता है, तो उसे पूरी फीस भरनी होती है।

पापा के ऑफिस के चेयरमैन को जब ये बात पता चली, तो उन्होंने पापा को समझाया। को लगा कि हां… बेटा ने कुछ अच्छा किया है। चेयरमैन की बेटी का एनएसडी में सिलेक्शन नहीं हुआ था।

कोई ?

अर्जुन एक नाटक का जिक्र करते हैं। , हम लोगों ने तीसरे साल एक नाटक किया था। को इसके गीत लिखने थे। में लेट हो रहा था।

इस नाटक के डायरेक्टर थे। के सभी स्टूडेंट्स से गाने लिखने को कहा। बेमन से एक गीत लिखा।

पासआउट होने के बाद 2002-05 तक दिल्ली में ही थिएटर करता रहा। नाटक में उतने पैसे नहीं मिलते थे। की भी जरूरत थी। इसी दौरान फरहान अख्तर की फिल्म ‘लक्ष्य’ को लेकर दिल्ली में ऑडिशन चल रहा था। काम तो नहीं मिला, लेकिन कुछ लोगों से कॉन्टैक्ट हुए और मैं मुंबई चला आया।

उन दिनों के संघर्ष को याद करते हैं। कहते हैं, मुंबई में गरीब घर से आने वालों के लिए संघर्ष सिर्फ एक्टिंग का नहीं, रोटी-कपड़ा-मकान का भी होता है। जिसके पास किराए देने तक के पैसे नहीं हैं, वो स्पा और मसाज कहां से करवा लेगा। का भी खेल है। के लिए टैलेंट तो होना ही चाहिए।

इतने थे नहीं कि 4 वक्त का खाना खाता। दिनभर में सिर्फ एक बार दाल-चावल और अचार खाता। रोटी खानी है, खरीदकर ले आता। की एक रोटी मिलती थी। एक कमरे में चार-चार लड़के रहते थे। बनने की ख्वाहिश लेकर मुंबई आए हुए थे।

को ऑडिशन के लिए नहीं बताता था। सभी तैयार होते थे। पूछने पर हर कोई एक-दूसरे से बहाना बनाता था, लेकिन ऐसा भी था कि चारों किसी एक ऑडिशन में ही मिल जाते थे। काम मिल जाता, को नहीं…

15 साल के एक्सपीरियंस के बाद कह सकता हूं कि एक्टर बनने के लिए टैलेंट से पहले लुक और लक का होना जरूरी है।

जब 4 साल तक कोई काम नहीं मिला, तो मैं नाटक और स्क्रिप्ट राइटिंग का काम करने लगा। था कि घर वालों से लड़कर मुंबई आया था एक्टर बनने और कर क्या रहा हूं।

मिडिल क्लास फैमिली की ये भी सबसे बड़ी दिक्कत है कि कोई भी चीज हम अपने लिए नहीं करते हैं। हर बच्चा मां-बाप और उनके बनाए समाज के लिए करता है। खरा उतरने की कोशिश करता है।

विदेशों में यदि कोई बच्चा फोटोग्राफर बनना चाहता है, तो घर वालों को कोई एतराज नहीं होता है, लेकिन हमारे यहां घर वाले कहीं भेजने से पहले ही कहते हैं, ‘सुनो कुछ करना तो ढंग का करना। तुमसे आस है।’

अर्जुन कहते हैं- ये भी दिलचस्प है कि मुंबई कोई आता है तो लोगों को लगता है कि वो एक्टर बनने के लिए नहीं, हीरो बनने के लिए गया है।  है, हीरोइन बनेगी।

अर्जुन कहते हैं- ये भी दिलचस्प है कि मुंबई कोई आता है तो लोगों को लगता है कि वो एक्टर बनने के लिए नहीं, हीरो बनने के लिए गया है। है, हीरोइन बनेगी।

मेरे गांव के लोग ताना मारते हुए पापा से कहते थे, ‘इनका लड़का भी तो हीरो बनने गया है, लेकिन किसी फिल्म में दिखा नहीं अभी तक।’

पापा फोन करके कहते थे, ‘गांव वाले, रिश्तेदार पूछते रहते हैं कि आपका बेटा टीवी पर दिखता तो है नहीं।’ था, हां… दिया हूं। थे, ‘अरे! गए। ‘

, कितना प्रेशर झेलेगा? से ज्यादा मानसिक संघर्ष हमें तोड़ता है। जीत गए, कुछ कर सकते हैं।

स्वास्तिक प्रोडक्शन हाउस से ‘फुलवा’ के पिता के ऑडिशन के लिए बुलाया गया। मैंने उनसे कहा- सभी बोलते हैं कि मैं अच्छी एक्टिंग करता हूं, लेकिन कोई रोल नहीं देता। , सेकेंड राउंड में ऑडिशन क्लियर हो जाता है। में किसी और को मौका मिल जाता है। ️

ऐसा कहा जाता है कि इस रोल के लिए अनु कपूर, विजय राज, रघुवीर यादव जैसे बड़े एक्टर्स को भी अप्रोच किया गया था। 5 ऑडिशन हो चुके थे। , जब 5 हजार लोगों का नहीं हुआ, मेरा क्या होगा?

खैर… इसमें मुझे काम तो मिल गया, लेकिन पिता के रोल को लेकर मैं खुश नहीं था। फूलन के पिता का किरदार निभाने के बाद लोगों ने जानना शुरू कर दिया। निकलता, घेर लेते। अपने जीवन में स्टारडम को देखा।

कब ब्रेक मिला?

कहते हैं, बतौर एक्टर नहीं, रोल के मुताबिक लोग पहचानने लगते हैं। जब मैंने पिता के रोल के लिए मना करना शुरू किया तो, काम ही मिलना बंद हो गया। 2 साल कोई काम नहीं मिला। घर की स्थिति खराब होने लगी, तो फिर से दो-तीन बड़े सीरियल्स में पिता का रोल करना पड़ा।

में मिले मौके का दिलचस्प किस्सा बताते हैं। कहते हैं, इसी दौरान शाहरुख खान की एक फिल्म ‘बिल्लू’ आई थी। 15 दिन मेरी शूटिंग इरफान खान, राजपाल यादव, ओमपुरी जैसे एक्टर्स के साथ हुई। 4 सीन किए, लेकिन जब फिल्म रिलीज हुई, तो मैं था ही नहीं।

तब पता चला कि सीरियल में जितनी शूटिंग होती है, वो दिखा दिया जाता है, लेकिन फिल्मों में ऐसा नहीं होता है। किसी फिल्म में कोई एक्टर कितना भी सीन क्यों न कर ले, जब तक फिल्म रिलीज न हो, तब तक कोई भरोसा नहीं।

बाद गुलाब गैंग में मुझे शर्मा जी का रोल मिला। दीक्षित और जूही चावला ने इस फिल्म के जरिए इंडस्ट्री में कमबैक किया था। सीन थे। ऐसा हुआ कि सभी सीन दिखाए गए। से लोगों ने जानना शुरू किया। ‘भारत’ में सलमान खान के साथ काम करने का मौका मिला।

वेब सीरीज 'कागज' के सेट का सीन है।  डायरेक्टर सतीश कौशिक, अर्जुन और एक्टर पकंज त्रिपाठी हैं।

वेब सीरीज ‘कागज’ के सेट का सीन है। डायरेक्टर सतीश कौशिक, अर्जुन और एक्टर पकंज त्रिपाठी हैं।

हैं, की एक और दिक्कत है। टीवी के एक्टर पर फिल्म डायरेक्टर भरोसा नहीं करते हैं, लेकिन अब काम मिलने लगा है। अक्षय कुमार की फिल्म ‘सेल्फी’ में काम किया हूं, जो रिलीज होने वाली है। एक्टर पंकज त्रिपाठी के साथ कागज और कागज-2 वेब सीरीज में काम किया हूं। लोग अब धीरे-धीरे मुझे स्वीकार करने लगे हैं। टीवी एक्टर होने का टैग लगा था, वो हट चुका है।

‘द चार्जशीट’, ‘चाचा विधायक हैं हमारे’, ‘क्रैश कोर्स’ जैसी वेब सीरीज में भी काम किया हूं। अभी बिहार की पृष्ठभूमि पर आधारित ‘AK 47’ वेब सीरीज रिलीज होने वाली है। फिलहाल उर्मिला मातोंडकर की वेब सीरीज ‘तिवारी’ की शूटिंग चल रही है।

त्रिपाठी के साथ काम करने को अपना टर्निंग पॉइंट मानते हैं। , फिल्मों में काम करने के दो मायने हैं। एक तो ढंग का किरदार मिले और जो सीन कर रहा हूं, उसकी वैल्यू हो।

OTT (ओवर द टॉप) के आने के बाद से छोटे-छोटे एक्टर को भी मिल रहे मौके को लेकर अर्जुन कहते हैं, इंडस्ट्री में किसी का स्टारडम ब्रेक नहीं हुआ है। पैदा हो रहे हैं। ही तरह की फिल्में दर्शकों के सामने परोसी जाती थीं। फिल्म बनाने का फॉर्मूला फिक्स था, लेकिन अब लोगों ने अपनी जिंदगी की कहानियां, आस-पास की चीजों को ऑन स्क्रीन देखना शुरू कर दिया है।

एक्टर अर्जुन बातचीत के अंतिम पड़ाव में बॉलीवुड की एक बड़ी खामी से भी रूबरू कराते हैं, जिसे कुछ महीने पहले एक्टर नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने भी उठाया था। वे कहते हैं, हिंदी फिल्मों में रोमन में लिखे स्क्रिप्ट से एक्टर्स को एक्टिंग में काफी दिक्कतें होती हैं।

यदि ‘तुम कहां जा रहे हो’ कहना है तो लिखा होता है, ‘TUM KAHAN JAA RHE HO’… यार! हिंदी बना रहे हो, में लिखो न? में जिन लोगों का हिंदी से कोई वास्ता नहीं है। फिल्में बना रहे हैं। शूटिंग सेट पर भी पूरी बातचीत इंग्लिश में होती है, लेकिन रीजनल सिनेमा में ऐसा नहीं है। यदि तमिल फिल्म है, तो वे लोग तमिल में ही बोलते-लिखते हैं।

कहानी की कुछ और स्टोरीज को पढ़ सकते हैं…

1. 15 की उम्र में शादी, 21 में तलाक:बच्चों को घर में बंद करके शूटिंग पर जाती; जो स्टंट एक्ट्रेस नहीं कर सकतीं, वो मैं करती हूं

9 साल की उम्र में मां की मौत। 15 की उम्र में शादी। 19 की उम्र में 2 बच्चे। 21 की में तलाक। के साथ ही स्ट्रगल शुरू हो गया। मैंने एक दिन में 500 रोटियां बनाईं, पैसों के लिए स्पा सेंटर में काम किया। किया। (पढ़िए पूरी )

2. जाने से पहले :मां पापड़ बनाती, पटना की में बेचता; स्लम के 2 बच्चों से ‘रामानुजन कोचिंग’ शुरू किया

1993-94 था। में एडमिशन के लिए ऑफर आया था। की तैयारी चल रही थी। खुश थी कि बेटा कैम्ब्रिज जाएगा, लेकिन हमारे पास हवाई जहाज के टिकट तक के पैसे नहीं थे। (पढ़िए पूरी )

3. शुरुआती दौर अंगुलिमाल जैसा रहा:अवध ओझा को कोचिंग चलाने के लिए बारटेंडर की जॉब करनी पड़ी, 1,000 से ज्यादा स्टूडेंट्स को UPSC करा रहे क्रैक

इलाहाबाद (अब प्रयागराज) में UPSC की तैयारी कर रहा था। अटेम्प्ट में भी नहीं क्रैक कर पाया तो घर चला गया। ने कहा, तुम्हारा तो गेम ही ओवर हो गया। जिंदगी भर मेरे सहारे जिंदा रहोगे। (पढ़िए पूरी )

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *