गरीबी के चलते हफ्ते में सिर्फ तीन दिन खाया खाना, कब्रिस्तान में करते थे डायलॉग्स की प्रैक्टिस | kadar khan birth anniversery, interesting facts, unknown facts

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कादर खान… एक्टिंग के महारथी, कॉमेडी में माहिर और कलम के भी उतने ही दमदार। में बेहतरीन डायलॉग्स लिखे। 300 से ज्यादा फिल्मों में अभिनय से छाप छोड़ी और बॉलीवुड में छा गए लेकिन ये सफर इतना आसान नहीं रहा। इतनी ज्यादा गरीबी में बीता कि हफ्ते में तीन दिन भूखे रहकर ही गुजारा करना पड़ता था लेकिन मां ने कादर खान की पढ़ाई नहीं छूटने दी। पढ़ाई के साथ-साथ कादर खान बचपन में मिमिक्री भी खूब करते थे और टैलेंट उन्हें जिंदगी में आ गया लेकिन आश्चर्य की बात है कि हिस्से ज्यादा अवॉर्ड नहीं आए हालांकि उनके निधन एक साल 2019 पद्मश्री से नवाजा गया।

कादर खान की उतार-चढ़ाव भरी जिंदगी की पूरी कहानी पढ़िए आगे…

मौत ना हो जाए इसलिए पूरा परिवार भारत आ गया

का जन्म अफगानिस्तान के काबुल में हुआ था। उनके पिता अब्दुल रहमान, अफगानिस्तान के रहने वाले थे और उनकी मां इकबाल बेगम, ब्रिटिश इंडिया से थी। कादर खान के जन्म के पहले उनके 3 बड़े भाई भी हुए पर सभी की 8 साल तक मौत हो गई थी। के जन्म के बाद उनकी मां इस बात से डर गई थी कि कादर की भी मौत ना हो जाए तो इसी वजह से उनका पूरा परिवार अफगानिस्तान से भारत आ गया। आने के बाद कादर खान का पूरा परिवार मुंबई की एक बस्ती में जाकर बस गया।

कादर का बचपन मां-बाप की लड़ाई और तलाक देखते हुए बीता

आए दिन खून और मारपीट होता रहता था। कादर खान के पिता को ये सब पसंद नहीं था जिस कारण कादर का बचपन मां-बाप की लड़ाइयां और तलाक देखते हुए बीता। तलाक के बाद कादर के ननिहाल वालों ने उनकी मां की जबरदस्ती दूसरी शादी करा दी। वालों का मानना ​​​​ कि कम उम्र में तलाक हो जाने के बाद कादर और उनकी मां का ख्याल कौन रखेगा। ही ये भी उस समय समाज में औरत का अकेला रहना भी गलत माना जाता था। दूसरी शादी हो जाने के बाद भी कादर के घर के हालात सुधरे नहीं और गरीबी भी कम नहीं हुई।

भीग मांगकर किया गुजारा, हफ्ते में 3 दिन खाते और 3 दिन बिना खाए रहते

के प्रति उनके सौतेले पिता का व्यवहार ठीक नहीं था। हालात भी बद से बद्तर थे। ना राशन होता और ना ही कमाई का कोई जरिया। इसी वजह से कादर के सौतेले पिता उन्हें 10 किलोमीटर उनके पहले पिता के पास 2 रुपए मांगने के लिए भेजते थे। साथ ही वो मस्जिद में जाकर भीख भी मांगते थे पर इन सबसे से भी परिवार का गुजारा सही ढंग से नहीं हो पाता था। आलम ये था कि कादर का पूरा परिवार सप्ताह में 3 दिन खाता और 3 दिन बिना खाए रहता। ये सारी चीजें बहुत परेशान करती थी।

बचपन को मां ने ही सवांरा था

बचपन से ही कादर की मां का सपना था कि वो अच्छे से पढ़ाई-लिखाई करके एक बड़े आदमी बने। की गरीबी उनको बहुत परेशान करती थी। उनके दोस्त भी उनसे कहा करते थे कि क्या रखा है इस पढ़ाई-लिखाई में। के साथ चलकर मजदूरी करो। गरीबी से तंग आकर कादर भी दोस्तों की बातों में आ गए थे और अपनी सारी किताबों को फेंक दिया था। ये बात उनकी मां को पता चली, तब वो कादर से बहुत नाराज हुई और कहा कि घर की गरीबी तुम्हारे इस कमाई से कम नहीं होगी। तुम सिर्फ अपनी पढ़ाई पर ध्यान दो और इसी पढ़ाई से जब बड़े आदमी बन जाओगे, तो गरीबी खुद ही खत्म हो जाएगी।

की आंखों के सामने मां ने दम तोड़ा था

को मां की बात दिल तक लगी और वो अपनी फेंकी हुई किताबों को वापस ले आए। मां से वादा भी किया कि वो अपनी पढ़ाई पूरी करेंगे। जीवन को संवारने में उनकी मां का सबसे बड़ा हाथ था। मां ही थी जो उनके हर कदम में सही राय दिया करती थीं। का साथ लंबे समय तक कादर के साथ नहीं था। उनकी मां को एक गंभीर बीमारी थी, लेकिन उन्होंने इस बीमारी की भनक कभी भी कादर को नहीं लगने दी। एक दिन कादर जैसे ही घर आए, उन्होंने देखा कि उनकी मां खून की उल्टियां कर रही हैं। कादर के होश उड़ गए। उन्होंने मां से पूछा कि ये क्या है और तुमने मुझे इस बारे में क्यों नहीं कुछ बताया था। मां ने जवाब दिया कि ये कुछ भी नहीं पर उनकी उल्टियां रुक नहीं रही थी। ये देखकर कादर आनन-फानन में डॉक्टर को लेने चले गए। जाकर उन्होंने डाॅक्टर को मां की हालात के बारे में बताया और साथ चलने को कहा। साथ चलने को मना कर दिया। मनाने के बाद भी जब डॉक्टर नहीं माने, तब कादर ने उन्हें फिल्मी अंदाज में उठाकर घर ले आए। कादर जैसे ही घर पहुंचे तो देखा कि मां की सांसे चलनी बंद हो चुकी थीं। उन्होंने डॉक्टर से मां का चेकअप करने के लिए कहा।

डॉक्टर ने मां का चेकअप किया और कहा कि अब वो इस दुनिया में नहीं हैं। से कादर पूरी तरह से टूट गए। उम्र में मां के साए से दूर होने का ही नतीजा है कि फिल्मों में लिखे गए उनके डायलॉग में मां की कमी साफ झलकती है।

फिल्मी डायलॉग्स की नकल करते थे कादर

से ही कादर खान को नकल करने की आदत थी। कब्रिस्तान में जाकर दो कब्रों के बीच बैठ खुद से बातें करते हुए फिल्मी डायालॅग्स बोलते थे। शख्स दीवार की आड़ में खड़े होकर उनको देखते थे। थे खान। अशरफ उस समय अपने एक स्टेज ड्रामा के लिए 8 साल के लड़के की तलाश में थे। को नाटक में काम दे दिया। से कादर खान की किस्मत बदल गईं।

भी बेहद होशियार थे कादर खान

के चले जाने के बाद भी कादर ने उनसे किया हुए वादे को पूरा और ड्रामा करने के साथ उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी। में बेहद होशियार थे। के इस्माइल युसुफ कॉलेज से ग्रेजुएशन किया। उन्होंने सिविल इंजीनियरिंग में पोस्ट ग्रेजुएशन किया। के एक इंजीनियरिंग कॉलेज में लेक्चरर भी थे।

ड्रामा दिखाने के लिए दिलीप साहब के सामने रखी थी 2 शर्त

के साथ ही कादर खान थिएटर से भी जुड़े रहे। उनका एक ड्रामा ताश के पत्ते बहुत फेमस हुआ था। दूर-दूर से लोग उनके इस ड्रामे को देखने के लिए आया करते थे। दौरान एक दिन कादर कॉलेज में पढ़ा रहे थे, तभी उनके पास अचानक दिलीप कुमार का कॉल आया। ने कॉल उठाया और उधर से आवाज आई कि मैं दिलीप कुमार बोल रहा हूं और मैं भी आप के ड्रामे ताश के पत्ते को देखना चाहता हूं। एक शांत। का नाम सुनते ही उनके हाथ पांव ठंडे पड़ गए थे। बाद कादर ने दिलीप साहब को जवाब दिया। कहा कि आप बेशक आ कर ड्रामा दे सकते है पर इसके लिए मेरी कुछ शर्त है। उन्होंने कहा कि आपको ठीक समय पर ड्रामा देखने के लिए आना होगा क्योंकि गेट बंद होने के बाद वो दोबारा नहीं खोला जाता और दूसरा ये कि आपको पूरा ड्रामा बैठ कर देखना होगा। खान के इन दोनों शर्तों को दिलीप साहब ने मान लिया और दूसरे दिन समय से आधे घंटे पहले ही वो ड्रामा देखने के लिए पहुंच गए। उन्होंने पूरा ड्रामा देखा।

ने दिया था फिल्मी ब्रेक

दिलीप साहब को कादर खान का ये ड्रामा बहुत पसंद आया और शो खत्म होते ही उन्होंने स्टेज पर इस बात की अनाउंसमेंट कर दी कि वो फिल्मों में कादर खान को काम देंगे। बाद दिलीप ने कादर को दो फिल्मों में साइन किया।

अलावा स्क्रिप्ट राइटिंग का भी किया काम

स्क्रिप्ट राइटर के रूप में कादर खान का करियर तब शुरू हुआ जब नरिंदर बेदी ने उनके द्वारा लिखे गए प्ले को देखा और उन्हें इंदर राज आनंद के साथ जवानी दीवानी की स्क्रिप्ट लिखने के लिए कहा , जिसके लिए खान को 1500 रुपये मिले i 1970 और 80 के दशक में उन्होंने कई फिल्मों के लिए कहानियां लिखीं।

बच्चन को सर जी नहीं बोलना, कादर खान को महंगा पड़ा

ने एक इंटरव्यू में बताया था कि एक दिन साउथ इंडियन फिल्म डायरेक्टर ने उन्हें फिल्मों के कुछ डायलॉग के बारे में बात करने को बुलाया था। डायरेक्टर ने कहा कि आप सर जी से नहीं मिले। ने कहा कि कौन सर जी। ने अमिताभ बच्चन की तरफ इशारा करते हुए कहा कि ये हैं सर जी। खान हैरान रह गए पर उन्होंने वहां कुछ बोला नहीं।

दरअसल, फिल्मी इंडस्ट्री में उस समय हर कोई अमिताभ बच्चन को सर जी कहकर बुलाने लगा था। कादर खान का कहना था कि मैं कैसे उनको सर जी कह सकता हूं। मेरे लिए एक दोस्त और छोटे भाई के जैसे हैं। यही नतीजा हुआ कि आखिरी समय में कादर खान ना कोई फिल्म मिली ना ही किसी फिल्म का डायलॉग लिखने को मिला।

बन गई मौत की वजह

कादर खान जीवन के अंतिम दिनों में सुप्रान्यूक्लियर पाल्सी बीमारी से जूझ रहे थे, जो कि एक लाइलाज बीमारी है। सांस लेने में तकलीफ के कारण उन्हें 28 दिसंबर 2018 को कनाडा के एक अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां वो अपने बेटे-बहू के पास इलाज कराने के लिये लिये आये थे। बाद 31 , 2018 को कनाडा में कादर खान का निधन हो गया था।

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