जब लालकृष्ण आडवाणी का रथ बिहार के समस्तीपुर में था तब विश्वनाथ प्रताप सिंह ने उन्हें अरेस्ट करने का ऑर्डर लालू प्रसाद यादव को दिया और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव मुंह ताकते रह गए

: ️ -पेच जानते थे। अखाड़े में भी माहिर खिलाड़ी रहे। 1989 में बोफोर्स विरोध के दम पर मांडा के राजा विश्वनाथ प्रताप सिंह ने गैर कांग्रेसी सरकार बनाई तो सिंह यादव का रसूख भी बढ़ा। लोकसभा चुनाव के ठीक बाद जब उत्तर प्रदेश में चुनाव हुए तो जनता दल जीत गई। वीपी सिंह ने अजित सिंह को सीएम और मुलायम सिहं यादव को डिप्टी सीएम घोषित कर दिया लेकिन पहलवान अड़ गया। मुलायम ने सियासी दांव खेलते हुए अजित सिंह के पाले के विधायक तोड़ लिए और विधायक दल के नेता बन बैठे। को मुलायम में अपना विरोधी दिखता था। बिहार प्रसाद यादव हो था। और मुलायम तो आज समधी हैं लेकिन दोनों ने एक दूसरे को भी निशाने पर लिया और दोनों वीपी सिंह के निशाने पर कभी न कभी रहे। कहा जाता है कि लालू यादव के सख्त ऐतराज के कारण ही मुलायम पीएम बनते -बनते रह गए। मुलायम देवीलाल के ज्यादा करीबी माने जाते थे। इसलिए भारतीय राजनीतिक इतिहास का जब निर्णायक मोड़ आया तो वीपी सिंह ने मुलायम को सेहरा नहीं लेने दिया। शह-मात के खेल में राजा ने लालू को एक ऐसा काम सौंप दिया जिसके बूते वो आज भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के विरोध का सबसे विश्वसनीय प्रतीक माने जाते हैं। हैं।

.पी. सिंह और देवीलाल की अदावत अगस्त 1990 में खुलकर सामने आ गई तो लालू यादव का स्वाभाविक विकल्प देवीलाल और चंद्रशेखर का साथ देने का होना चाहिए था। उन दोनों व्यक्तियों ने कुछ ही महीनों पहले बिहार का मुख्यमंत्री बनने में उनकी मदद की थी। के भरोसे रहकर तो लालू यादव का कुछ होना नहीं था। लालू यादव ने राजनीति के कुछ पाठ बहुत पहले कंठस्थ कर लिये थे। से एक था कि दोस्ती और दुश्मनी कभी हमेशा के लिए नहीं होतीं और दूसरा यह कि राजनीति में स्वार्थ सर्वोपरि होता है। सिंह का साथ दिया।

राम रथ को रोकने की तार्किक जगह उत्तर प्रदेश ही होनी चाहिए थी—शांति और व्यवस्था के नाम पर। वीपी सिंह की एक समस्या थी। नहीं चाहते थे कि मुलायम सिंह यादव मुसलमानों के बीच ज्यादा लोकप्रिय हो जाएं।

ठाकुर

यादव ने मंडल के जादुई पिटारे को खोला ही था कि एक और उपहार मांडा के राजा ने उन्हें थमा दिया। 1989 के चुनाव में दो से 85 सीटों पर पहुंची भाजपा के नेता और हिंदू हृदय सम्राट लालकृष्ण आडवाणी ने ऐतिहासिक रथ यात्रा का ऐलान किया। 1990 में गुजरात के सोमनाथ से इसकी शुरुआत हुई। के अंतिम चरण में आडवाणी अपने रथ के साथ बिहार पहुंचने वाले थे। सिंह की सरकार भाजपा के समर्थन पर ही टिकी थी। यात्रा जनता दल के उसूलों के खिलाफ थी। वीपी सिंह सरकार पर तमामत तरह के सवला उठने लगे।

हिसाब किया
दल के नेताओं ने आडवाणी पर सांप्रदायिक कार्ड खेल देश का माहौल खराब करने का आरोप लगाया। बिहार पहुंचा तब सरकार को डर लगने लगा। अयोध्या के करीब पहुंच चुके थे। प्रदेश में तनाव का माहौल था। उनका प्रवेश आग लगा सकता था। ; और ? संकर्षण ठाकुर ने अपनी किताब बंधु बिहारी में लिखा है तक ​​ अनुमति बाद राम रथ को की तार्किक जगह उत्तर प्रदेश होनी होनी चाहिए थी व्यवस्था के नाम पर। वीपी सिंह की एक समस्या थी। नहीं चाहते थे कि मुलायम सिंह यादव मुसलमानों के बीच ज्यादा लोकप्रिय हो जाएं। यूपी ही वीपी सिंह की कर्मभूमि थी और वो अपने लिए सियासी जमीन बचाए रखना चाहते थे।

चंद्रशेखर ने जनता दल तोड़ दिया तो लालू वीपी सिंह के साथ रहे

धर्मनिरपेक्षता का ताज मुलायम सिंह यादव कतई नहीं देना चाहते थे। लालू यादव को आडवाणी का रथ रोकने के लिए कहा। लालू यादव जिसे सीएम बनाने के खिलाफ थे वीपी सिंह। ये गिफ्ट तहे दिल से कबूल किया। वीपी सिंह ने ऑर्डर दिए तब आडवाणी हजारीबाग से होते हुए गया के रास्ते समस्तीपुर जिले में प्रवेश कर गए थे। मैदान से भी आडवाणी को खबरदार किया था। वे कई दिनों से अपनी लाइनें तैयार कर रहे थे- अगर कोई इस देश में हिम्मत किया है, इस तोड़-फोड़वाले रथ को रोकने के लिए तो वह है लालू यादव। लालू यादव जान पर खेल जाएगा, लेकिन फिर से इस देश का बँटवारा हिंदू-मुसलमान में नहीं होने देगा। ने अरेस्ट करने की जिम्मेदारी डीआईजी रामेश्वर उरांव और आईएएस राजकुमार सिंह को सौंपी। November 22, 1990 की रात आडवाणी के रथ का पहिया समस्तीपुर में ही थम गया। अगली सुबह लालू की नींद रामेश्वर उरांव के फोन से टूटी – सर, हमने उन्हें अरेस्ट कर लिया है।

ने हेलिकॉप्टर के जरिए आडवाणी को मंसजौर स्थित बिहार सरकार के गेस्ट हाउस में भेज दिया। वीपी सिंह को इस बात की जानकारी दी। लालू धर्मनिरपेक्षता के मसीहा के तौर पर छा चुके थे। मंद मंद मुस्कुरा रहे थे। सिंह यादव को आडवाणी की गिरफ्तारी का श्रेय लेने से वो रोक चुके थे। साथ ही वीपी सिंह के दिन भी गर्दिश में जाने लगे। आडवाणी के अरेस्ट होने के ठीक 13 दिनों बाद पांच नवंबर, 1990 के दिन चंद्रशेखर ने जनता दल को तोड़ दिया और समाजवादी जनता पार्टी बना ली। मुलायम सिंह यादव और देवीलाल भी चंद्रशेखर के साथ हो लिए। सात नवंबर के दिन वीपी सिंह के खिलाप अविश्वास प्रस्ताव भारी बहुमत से पास हो गया। मांडा के राजा जमीन पर आ गिरे और चंद्रशेखर कांग्रेस के समर्थन से देश के नए प्रधानमंत्री बन गए। सरकार भी कांग्रेस के सपोर्ट से चलती रही। दो साल बाद मुलायम ने अपनी समाजवादी पार्टी बनाई कांशीराम के सहयोग से 1993 में दूसरी बार सीएम बने। यादव ने राजा के उपहार का मान रखा या कहिए बिहार के राजपूत वोट बैंक की खातिर वीपी सिंह के साथ रहे।

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