‘RRR’ का ऑस्कर कैंपेन करोड़ों का, ऑफिशियल एंट्री का पूरा खर्च सरकारी | The cost of ‘RRR’ Oscar campaign would be in crores…if the official entry was made, the entire expenditure would have been government

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फिल्म जगत का सबसे प्रतिष्ठित अवॉर्ड माना जाने वाला ऑस्कर किस-किस के हाथ आएगा, ये मार्च, 2023 में तय होगा। इस दौड़ का शोर इस बार भारत में ज्यादा होगा।

…भारत की ऑफिशियल एंट्री न बन पाने के बाद अब एस.एस. राजामौली की ‘RRR’ अपने दम पर नॉमिनेशन की दौड़ में है।

भारत की ऑफिशियल एंट्री गुजराती फिल्म ‘छेलो शो’ (लास्ट शो) है। ‘RRR’ के ऑस्कर कैम्पेन ने भारत में फिर उस बहस को हवा दी है कि ऑस्कर की एंट्री के लिए फिल्म के चुनाव का क्राइटेरिया क्या होना चाहिए। ‘RRR’ के कैंपेन ने ये सवाल भी खड़ा किया है कि बाकी हिट फिल्में भी ऑफिशियल एंट्री न बन पाने पर खुद अवॉर्ड के लिए क्यों नहीं एंट्री भेजतीं।

जवाब इस तरह के कैंपेन के खर्च में छिपा है। ऑफिशियल एंट्री बनने वाली फिल्म का कैंपेन फिल्म फेडरेशन ऑफ इंडिया के खर्च पर होता है। भारत सरकार ने एक कॉरपस फंड भी बना रखा है। ऑफिशियल एंट्री का प्रचार इसी फंड से किया जाता है।

में कैंपेन का खर्च फिल्म बनाने वाली कंपनी का होता है। करोड़ों रुपए का है। एंट्री बनने वाली फिल्म के प्रोड्यूसर चाहें तो वे कैंपेन को गति देने के लिए अपने स्तर पर भी प्रचार कर सकते हैं। ऐसा ‘लगान’ के लिए आमिर खान और आशुतोष गोवारिकर ने किया था।

‘RRR’ का ऑस्कर कैंपेन ग्लोबल असर भी रखता है। दरअसल, ऑस्कर के नॉमिनेशन के क्राइटेरिया पर बहस सिर्फ भारतीय एंट्री तक सीमित नहीं है। के इतिहास में ऐसा बहुत कम ही हुआ है कि उस साल की सबसे बड़ी कॉमर्शियल बॉक्स ऑफिस हिट फिल्म ही बेस्ट फिल्म अवॉर्ड भी जीत पाई हो।

अभी ऑस्कर अवॉर्ड देने वाली एकेडमी ऑफ मोशन पिक्चर आर्ट्स एंड साइसेज ने फिल्मों को चुनने का प्रोसेस शुरू किया है। 15 नवंबर तक दुनिया भर की फिल्में अवॉर्ड के लिए अपनी एंट्री भेज सकती हैं। , 2023 फाइनल नॉमिनेशन्स की घोषणा होगी। यह खुलासा होगा कि अवॉर्ड किसे मिला।

यानी ये तय है कि अगले 6 महीनों में भारतीय सिनेप्रेमियों के बीच बहस जारी रहेगी। इस बहस को बेहतर समझना चाहते हैं तो जानिए, आखिर क्या है ऑस्कर के फाइनल नॉमिनेशन्स तक किसी फिल्म के पहुंचने का प्रोसेस और खर्च…

ऑफिशियल एंट्री पर विवाद क्यों

ऑस्कर के लिए भारत की ऑफिशियल एंट्री का विवादों में आना कोई नई बात नहीं है। पिछली बार भी ऑस्कर के लिए तमिल फिल्म ‘कूजहांगल’ को एंट्री बनाने पर उठे थे कि ‘शेरशाह’ और ‘सरदार ऊधम सिंह’ के बजाय इस फिल्म को क्यों भेजा गया।

विवाद किसी गैर हिंदी फिल्म तक भी सीमित नहीं हैं। विधु विनोद चोपड़ा की ‘एकलव्य’ और अनुराग बासु की ‘बर्फी’ को ऑफिशियल एंट्री बनाए जाने पर ऐसा ही विवाद उठा था।

फिल्म फेडरेशन ऑफ इंडिया का कहना है कि ऑफिशियल एंट्री के लिए फिल्म को चुनते वक्त उसकी कहानी, क्राफ्ट्समैनशिप यानी फिल्म बनाने की कला के साथ ही कई फैक्टर्स पर ज्यूरी विचार करते हैं।

की जड़ भारत में नहीं ऑस्कर के घर अमेरिका में

दरअसल, ऑस्कर अवॉर्ड के लिए फिल्मों को नॉमिनेट करने में भी अकेडमी ऑफ मोशन पिक्चर आर्ट्स एंड साइंसेज के ज्यूरी मेंबर कुछ ऐसे ही नियम देखते हैं।

2020 में ऑस्कर अवॉर्ड के लिए फिल्मों को चुनने में 9527 ज्यूरी मेंबर्स ने वोटिंग की थी। फिल्म के फाइनल नॉमिनेशन के बाद वोटिंग सिर्फ एक्टिव और लाइफ टाइम मेंबर्स ही करते हैं।

हर साल जिन फिल्मों को बेस्ट फिल्म, बेस्ट डायरेक्टर या बेस्ट स्क्रीनप्ले जैसे मिलते हैं, जरूरी नहीं कि वे उस साल की सबसे ज्यादा कमाई वाली या सबसे लोकप्रिय फिल्में हों।

उदाहरण के लिए 2019 में ‘एवेंजर्स एंडगेम’ सबसे बड़ी ब्लॉकबस्टर फिल्म थी, मगर बेस्ट फिल्म का ऑस्कर ‘ग्रीन बुक’ को मिला था।

हॉलीवुड फिल्में ऑस्कर से हर बार गायब भी नहीं होतीं

2020 आई निर्देशक क्रिस्टोफर नोलन की फिल्म 'टेनेट' उस साल की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म थी।  ऑस्कर में बेस्ट फिल्म नहीं बनी, मगर बेस्ट विजुअल एफेक्ट्स का अवॉर्ड जीता।

2020 आई निर्देशक क्रिस्टोफर नोलन की फिल्म ‘टेनेट’ उस साल की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म थी। ऑस्कर में बेस्ट फिल्म नहीं बनी, मगर बेस्ट विजुअल एफेक्ट्स का अवॉर्ड जीता।

भी नहीं है कि ऑस्कर की ज्यूरी बॉक्स ऑफिस पर हिट फिल्मों को नकार देती है। 1972 में आई फिल्म ‘द गॉडफादर’, 1997 में आई ‘टाइटैनिक’ और 2003 में आई ‘लॉर्ड ऑफ द रिंग्स’ जैसी कई फिल्में हैं जो बॉक्स ऑफिस और ऑस्कर अवॉर्ड्स दोनों में अच्छा प्रदर्शन कर चुकी हैं।

‘एवेंजर्स: एंडगेम’ और ‘एवेंजर्स: इनफिनिटी वॉर’ भी ऑस्कर की बेस्ट विजुअल एफेक्ट्स की कैटेगरी में अवॉर्ड जीत चुकी हैं। ‘टेनेट’ को बेस्ट विजुअल एफेक्ट्स का अवॉर्ड मिला था, जबकि बेस्ट प्रोडक्शन डिजाइन की कैटेगरी में वह नॉमिनेट हुई थी।

‘स्पाइडरमैन : नो वे होम’ को भी बेस्ट विजुअल एफेक्ट्स की कैटेगरी में नॉमिनेट किया गया था, मगर वह अवॉर्ड नहीं जीत पाई।

हमारी हिट फिल्में ऑस्कर में क्यों नहीं जाती

अवॉर्ड के लिए नॉमिनेट वाली ये सभी फिल्में जनरल कैटेगरी के जरिये ही एंट्री करती हैं। इस रास्ते वो हिंदी फिल्में भी ऑस्कर की दौड़ में जा सकती हैं जो भारत की ऑफिशियल एंट्री नहीं बन पातीं। बहुत कम ही होता है। वजह है ऑस्कर के लिए कैंपेनिंग का खर्च कम नहीं हैं।

कैंपेन के लिए करीब 6 महीनों तक फिल्म की पूरी टीम अमेरिका में ही कैंप करती है। सही पब्लिसिटी फर्म को चुनना भी जरूरी होता है जो हॉलीवुड के सही सर्किल्स में फिल्म को प्रमोट करे। की स्क्रीनिंग्स और रिसेप्शन्स के साथ ही प्रमोशन से जुड़े ऐसे इवेंट प्लान करने होते हैं जो ऑस्कर के नियमों के दायरे में हों।

काम खासा खर्चीला है। वहां पूरी दुनिया की फिल्में कॉम्पिटिशन में होती हैं, इसलिए ज्यादातर प्रोडक्शन कंपनियां अवॉर्ड मिलने के कम चांस को देखते हुए इतना खर्च नहीं करना चाहती हैं।

हिना ओझा

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